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1428/1-5/97/172/85-R-5

शासनादेश संख्या 1428/1-5/97/172/85-R-5 इस जिले की स्थापना का आधार है। यहाँ इस शासनादेश और जिले के गठन से जुड़ी विस्तृत जानकारी दी गई है:


1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और विभाजन

बलरामपुर जिला पहले गोंडा (Gonda) जनपद का हिस्सा हुआ करता था। प्रशासनिक दृष्टि से गोंडा एक बहुत बड़ा क्षेत्र था, जिससे दूरदराज के इलाकों (जैसे तुलसीपुर या पचपेड़वा) के निवासियों को जिला मुख्यालय तक पहुँचने में काफी कठिनाई होती थी। विकास कार्यों की गति तेज करने के लिए गोंडा के उत्तरी हिस्से को अलग कर बलरामपुर बनाया गया।

2. शासनादेश के मुख्य बिंदु

दिनांक 25 मई, 1997 को जारी इस अधिसूचना के तहत निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे:

  • मुख्यालय: बलरामपुर शहर को ही नवसृजित जिले का मुख्यालय घोषित किया गया।

  • तहसीलें: गठन के समय इसमें मुख्य रूप से तीन तहसीलें शामिल की गईं:

    1. बलरामपुर

    2. तुलसीपुर

    3. उतरौला

  • प्रशासनिक संरचना: इसी आदेश के बाद जिले में जिलाधिकारी (DM) और पुलिस अधीक्षक (SP) के पदों का सृजन हुआ और जिले ने स्वतंत्र रूप से कार्य करना शुरू किया।

3. जिले की भौगोलिक और सांस्कृतिक स्थिति

गठन के बाद बलरामपुर की पहचान निम्नलिखित विशिष्टताओं से और मजबूत हुई:

  • शक्तिपीठ देवीपाटन: जनपद के तुलसीपुर में स्थित माँ पाटेश्वरी का मंदिर प्रसिद्ध ५१ शक्तिपीठों में से एक है, जो जिले की आध्यात्मिक पहचान है।

  • श्रावस्ती का प्रभाव: ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र भगवान बुद्ध की कर्मस्थली श्रावस्ती के अत्यंत निकट है, जिससे इसका ऐतिहासिक महत्व बढ़ जाता है।

  • सीमाएँ: जिले की सीमा उत्तर में नेपाल राष्ट्र से लगती है, जो इसे सामरिक (Strategic) दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है।


4. प्रशासनिक विवरण (वर्तमान संदर्भ में)

गठन के बाद से जिले ने काफी प्रगति की है। वर्तमान में इसकी संरचना इस प्रकार है:

विवरण संख्या/नाम
मंडल देवीपाटन (मुख्यालय: गोंडा)
विकास खंड (Blocks) 9 (बलरामपुर, तुलसीपुर, उतरौला, श्रीदत्तगंज, आदि)
प्रमुख नदियाँ राप्ती, बूढ़ी राप्ती

5. महत्व

इस शासनादेश का सबसे बड़ा प्रभाव यह पड़ा कि तराई क्षेत्र के इस पिछड़े इलाके में सरकारी योजनाओं की पहुँच सीधी हो गई। शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के लिए अलग से बजट आवंटन होने लगा, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और विकास को गति मिली।